इसरो की अंतरिक्ष में लम्बी छलांग: चंद्रयान अभियान

Authors

  • सत्य पाल सिंह मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत -२७३०१० , Madan Mohan Malaviya University of Technology image/svg+xml Author

DOI:

https://doi.org/10.66346/ev.v4i1.2026.2

Keywords:

  • अपोलो मिशन,
  • लूना मिशन,
  • विक्रम लैंडर,
  • प्रज्ञान रोवर,
  • दक्षिणी ध्रुव,
  • चांग मिशन

Abstract

चंद्रयान-2 एवं चंद्रयान -3 मिशन इसरो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पहले मिशन  की तुलना में बहुत ही जटिल मिशन थे।  इसे एक बड़ी तकनीकी छलांग माना जा सकता है। 22 जुलाई, 2019 को चंद्रयान-2 को  लॉन्च किये जाने के उद्देश्य एक ही मिशन में चंद्रमा के केवल एक हिस्से का नहीं, बल्कि एक्सोस्फीयर, सतह और सतह के नीचे के सभी हिस्सों का  अध्ययन करना था। लूनर ऑर्बिटर को पहले ही  उसकी निर्धारित कक्षा में स्थापित कर  इसके साथ जाने वाले आठ अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करके चंद्रमा के विकास और ध्रुवीय क्षेत्रों में खनिजों और पानी के अणुओं की मैपिंग के बारे में हमारी समझ में  वृद्धि करना था। इसमें लगा ऑर्बिटर कैमरा अब तक के किसी भी चंद्र मिशन में सर्वाधिक रिज़ॉल्यूशन (0.3 मीटर) वाला कैमरा था।सटीक लॉन्च और मिशन मैनेजमेंट के  कारणों से लूनर ऑर्बिटर एक साल के बजाय लगभग 7 साल तक कार्य करता रहा है।  मिशन के हर चरण के लिए सफलता के मानदंड के अनुसार इस  मिशन के 90 से 95% लक्ष्य पूरे हो चुके हैं।  यद्यपि की चंद्रयान -2  आंशिक रूप से असफल रहा, क्योंकि विक्रम लैंडर को ले जाने वाले प्रोपल्शन मॉडयूल से चन्द्रमा की सतह से लगभग 2.1 किलोमीटर ऊपर इसरो  से उसका संपर्क टूट गया था और विक्रम लैंडर की हार्ड लैंडिंग हुई थी।लेकिन वर्ष 2019 में भारत ने अंतरिक्ष में बड़ी छलांग लगा दी ।  इसी वर्ष मानव के चन्द्रमा पर कदम रखने के 50 वर्ष भी पूरे हुए थे।  इस आलेख में पूर्व के चंद्र मिशनों के बारे में जानकारी देते हुए मानव की इस 50 वर्ष की यात्रा का भी उल्लेख किया गया है। चन्द्रयान-3 का प्रक्षेपण चन्द्रयान-2 के अपग्रेडेड सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर के साथ LLM-III M4 द्वारा प्रक्षेषण यान द्वारा किया गया। इसे पृथ्वी की अतिदीर्घाकार कक्षा 170x36500 किलोमीटर में स्थापित किया गया । चूंकि चन्द्रयान-3, चन्द्रयान-2 की पुनरावृत्ति हेतु किया गया अतः चन्द्रयान -3 मिशन की कुल लागत ₹ 615 करोड़ ही बैठी जबकि चन्द्रयान-2 की कुल लागत ₹ 978 करोड़ थी। चन्द्रयान-3 के प्रमुख उद्देश्य चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर विक्रम लैण्डर और प्रज्ञान रोवर को उतारना और चन्द्रमा की सतह पर वैज्ञानिक परीक्षण करना था। चन्द्रयान-3 में आर्बिटर माड्यूल का प्रयोग नहीं किया गया और चन्द्रयान-2 के ही सक्रिय आर्बिटर माड्यूल के सहारे ही पूरे अभियान को अंजाम दिया गया। जहाँ पहले विक्रम लैडर 2m/sec की गति से चन्द्रमा की सतह पर उत्तरने में सक्षम था, उसकी सीमा को बढ़ा कर 3m/sec कर दिया गया। लैंडर के साथ अधिक ईंधन भेजा गया। चन्द्रयान-2 के लैंडर के मध्य में लगे ईजन को बेहतर कार्यदक्षता के लिए हटा दिया गया। चन्द्रयान-3  में लगे सोलर पैनल का क्षेत्रफल बढ़ा दिया गया जिससे विक्रम-लैण्डर को अधिक शक्ति प्राप्त हो सके।  प्रज्ञान रोवर में लगी बैटरी की क्षमता को भी बढ़ा दिया गया। इस आलेख में  विश्व के कई देशों यथा अमेरिका, रूस , यूरोप, चीन, एवं जापान इत्यादि के सफल एवं असफल चंद्र-अभियानों का अध्ययन कर संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है। 

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Published

2026-09-23

How to Cite

सिंह स. प. (2026). इसरो की अंतरिक्ष में लम्बी छलांग: चंद्रयान अभियान. ई-विज्ञानम, 4(1), 6-16. https://doi.org/10.66346/ev.v4i1.2026.2